गुरुवार, 5 मई 2016

खुदकुशी, जो सियासी बाज़ार में नहीं बिक पाते

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक भारत में हर साल औसतन 1 लाख से ज्यादा लोग खुदकुशी कर लेते हैं। इनमें छात्रों की खुदकुशी का प्रतिशत 5 फीसदी से ज्यादा है। हाल में 17 जनवरी 2016 को 26 साल के हैदराबाद यूनिवर्सिटी के एक पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने इस दुनिया अलविदा कह दिया। रोहित की आवाज़ आज दिल्ली की सड़कों से लेकर संसद तक सुनाई दे रही है। सोशल मीडिया पर रोहित के इंसाफ के एक बड़ा तबका आगे आया है, उसकी तस्वीरों को लोगों ने अपना प्रोफाइल फोटो बनाया है। देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार और अभी जेल से अंतरिम ज़मानत पर बाहर आए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने रोहित को अपना आदर्श बताया। कन्हैया ने रोहित को न्याय मिलने तक जंग का ऐलान किया।
ये अच्छी बात है कि एक छात्र की लड़ाई लड़ने एक छात्र आगे आया । लेकिन क्या इस देश में सिर्फ रोहित ने ही सुसाइड की है? क्या 17 जनवरी 2016 के बाद से देश में छात्रों ने सुसाइड नहीं की? ये सवाल बार-बार मेरे मन में उठ रहे हैं, और आगे इन्ही की पड़ताल है।
17 जनवरी के बाद से राजस्थान के कोटा, मध्यप्रदेश, और यूपी समेत दूसरे राज्यों में कई छात्रों ने खुदकुशी की। लेकिन ये खुदकुशी आज के सियासी बाज़ार में ‘बिकने’ लायक नहीं थे, लिहाजा आपमें से कईयों को इनके बारे में पता भी नहीं होगा।
रोहित ने जिस वक्त इस दुनिया को छोड़ा उस समय हैदराबाद में नगर निगम चुनाव का प्रचार-प्रसार जोरशोर से चल रहा था। रोहित चूंकि अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन से जुड़ा हुआ था, उसका वैचारिक विवाद बीजेपी के अनुसंगी संगठन एबीवीपी से था। वो हैदराबाद यूनिवर्सिटी में आतंकवादी याकूब मेमन पर कार्यक्रम करता था और एबीवीपी उसका विरोध। इस मामले में दो केंद्रीय मंत्रियों के हस्तक्षेप की बात आई, और बस क्या था। ये मौत सियासी बाजार के लिए सबसे अच्छा प्रोडक्ट थी। इस दुखद घटना के बाद हर सियासी दल अचानक से दलितों का हितैषी बन गया, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तमाम नेताओं ने हैदराबाद का सियासी दौरा किया।
अचानक से कैडल लाइट वाले प्रज्वलित हो गए, और एक मां जो अपने बेटे के गम में थी, उसे जबरन अपने साथ लेकर सड़कों पर घूमते रहे।

कार्टूनिस्ट मंजुल के ये रेखाचित्र के इस मौत और सियासी त्रासदी को बेहतर तरीके से दिखा रहे हैं। बाकी आप आप इस तस्वीर को देखकर खुद सोचिए हम किस दिशा में जा रहे हैं।
राजस्थान का कोटा शहर देश में इंजीनियरिंग और मेडिकल की नर्सरी कहा जाता है। यहां हर साल करीब 1 लाख 70 हजार बच्चे इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना लेकर आते हैं। लेकिन अफसोस, पिछले कुछ सालों में यहां कई बच्चों के सपने हमेशा के लिए दफ्न हो गए। NCRB के 2014 के आकड़ों के मुताबिक कोटा में छात्रों की सुसाइड में 61 फीसदी की वृद्धि हुई है। साल 2015 में कोटा में करीब 29 छात्रों ने खुदकुशी कर ली।
वर्ष          खुदकुशी      की संख्या
1991                       1     1992                       3
1993                       2     1994                       1
1995                       4     1996                       6
1997                       4     1998                       2
1999                       7     2000                       26
2001                       11    2002                       NIL
2003                       18    2004                       21
2005                       15    2006                       9
2007                       32    2008                       7
2009                       15    2010                       9
2011                       4     2012                       2
2013                       17    2014                       26
2015                       29
ये आकड़े भारत में उदारीकरण की शुरूआत के बाद के हैं, 1991 में जब भारत में उदारीकरण की शुरूआत हुई थी, तब से लेकर आजतक हर साल कोटा में कोई न कोई बच्चा अपने सपने को कब्र में दफ्न कर रहा है। हैरानी की बात ये है कि ये सभी बच्चे उन कोचिंग संस्थाओं में पढ़ते हैं, जो निजी है, और शिक्षा के नाम पर भारी भरकम फीस लेते हैं। चूंकि ये मासूम बच्चे किसी सियासी दल के प्रोडक्ट नहीं बन पाते इसीलिए इनकी मौत पर किसी संसद में क्या किसी राज्य में भी हंगामा नहीं होता। कोई स्थानीय क्रांतिकारी भी हाथों में मोमबत्ती लेकर सड़क पर नहीं निकलता।

2015 में राजस्थान के कोटा में खुदकुशी  के आकड़े

5 जून 2015 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से कोटा में अपनी बेटी को कोचिंग में दाखिला दिलाने आये पिता ने अपनी बेटी के साथ पंखे से लटक कर जान दे दी ।
5 जून 2015 को झारखण्ड की रहने वाली एक छात्रा जो कोटा में ऐलन कोचिंग सेंटर से कोचिंग कर रही थी, तनाव के चलते खुदकुशी कर ली ।
7 जून 2015 को यूपी के सहारनपुर के रहने वाले 17 साल के छात्र भूपेंद्र ने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी, भूपेंद्र ऐलन संस्थान से कोचिंग करता था ।
16 जून 2015 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर से कोटा में मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्र दिव्यांश ने खुदकुशी कर ली । दिव्यांश एलन संस्थान से मेडिकल की तैयारी कर रहा था ।
20 जुलाई 2015 को इलाहबाद से कोटा में आईआईटी की कोचिंग कर रहे छात्र अविनाश ने खुदकुशी कर ली । अविनाश रेजोनेंस कोचिंग संस्थान से तैयारी करता था ।
11 अगस्त 2015 को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से कोटा में एलन संस्थान से आईआईटी की तैयारी कर रहे छात्र योगेश ने खुद को आग लगा कर अपनी जान दे दी ।
13 अक्टूबर 2015 को बिहार के मुजफ्फरपुर से आकर एलन संस्थान से मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्र सिद्दार्थ ने अपनी जान दे दी ।
28 अक्टूबर 2015 को राजस्थान के भीलवाड़ा के 17 साल के छात्र विकास ने पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी । विकास कोटा के रेसोनेंस संस्थान से आईआईटी की तैयारी कर रहा था ।
1 नवम्बर 2015 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से कोटा में मेडिकल की तैयारी कर रही छात्रा अंजलि आनंद ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली । अंजलि एलन संस्थान से कोचिंग करती थी ।
3 दिसंबर 2015 पंजाब के लुधियाना के छात्र वरुण ने पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी । वरुण भी एलन कोचिंग संस्थान से कोचिंग कर रहा था ।
23 दिसंबर 2015 को राजस्थान के धौलपुर के रहने वाले शिवदत्त ने भी फंदे से लटक कर अपनी खुदकुशी कर ली। शिवदत्त एलन कोचिंग संस्थान से कोचिंग कर रहा था ।
अब बात मध्यप्रदेश की, इस साल मध्यप्रदेश में अबतक 8 बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं।
2 मार्च- इंदौर की 10वीं की स्टूडेंट गुलसार ने खुदकुशी की
2 मार्च- भोपाल की 9वीं की छात्रा प्रगति ने सुसाइड कर लिया, 27 फरवरी – 9वीं के छात्र सुमित ने किया सुसाइड
23 फरवरी – 11वीं के छात्र आदित्यमान सिंह ने की खुदकुशी, 10 फरवरी – इंजीनियर के छात्रा मल्ला वेंकटेश ने दी जान
1 फरवरी – बीकॉम के छात्र अंकित ग्रोवर ने किया सुसाइड , 18 जनवरी – 8वीं में पढ़ने वाली छात्रा प्रिया कुचबंदिया ने दी जान, 13 जनवरी – 11वीं की छात्रा सृष्टि ने की खुदकुशी
NCRB के मुताबिक साल 2013 में 2,471 बच्चों ने एग्जाम में फेल होने के कारण खुदकुशी कर ली।
छात्रों की खुदकुशी के बाद अब बात इस देश के अन्नदाता की। कितना अजीब ज़िंदगी जी रहे हैं, ज़रा सोचिए, जो अन्नदाता हमारे लिए मेहनत करके खेत में अन्न उगाता है वहीं भूखे मर जाता है।
दो दिन पहले राज्यसभा में केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने बताया कि अकेले 2015 में महाराष्ट्र में 3,228 हजार किसानों ने अपनी जान दी। जो पिछले 14 सालों में सबसे ज्यादा है। इस साल जनवरी से लेकर अबतक 124 से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है।
अब ज़रा सोचिए, जिस देश में हर दिन कोई न कोई किसान, मज़दूर, ग़रीब, छात्र किसी न किसी वजह से खुदकुशी करता है, लेकिन आखिर रोहित वेमुला की खुदकुशी ही संसद में क्यों गूंजती है? आखिर रोहित वेमुला के लिए ही सड़कों पर मोमबत्ती क्यों जलती है? आखिर दिल्ली की सरकार रोहित वेमुला के भाई को ही नौकरी क्यों ऑफर करती है?
इस देश में हर दिन कोई न कोई रोहित मरता है, इस देश में हर दिन कोई न किसान मरता है, लेकिन उसकी आवाज़ें संसद की मोटी चहारदीवारी के अंदर इसीलिए नहीं गूंज पाती, कि वो सियासी बाज़ार का परफेक्ट प्रोडक्ट नहीं होता है।

मंगलवार, 2 जून 2015

हमारी नामाकी हंगामा खड़ा करती है

सार्थक तर्क करने की शक्ति हमें न केवल प्रबुद्ध लोगों के बीच सम्मान दिलाती है, बल्कि हम खुद हर परिस्थिति में अपने आप को ज्यादा मज़बूत महसूस कर पाते हैं। लेकिन जब हमारे पास अपनी बात को उचित तरीके से कहने के लिए शब्दों का अभाव होता है, विचारों की कमी होती है, तब हम सामने वालों पर न केवल अर्नगल आरोप लगाते हैं, बल्कि उत्तेजित होकर अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश भी करते हैं। पिछले दो दिन की दो घटनाएं ऐसी हैं जिन पर शायद ये मेरे विचार ठीक बैठते हैं । पहली घटना केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी से जुड़ी है, और दूसरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से। विदेश मंत्रालय के साल भर के कामों का ब्यौरा देते हुए सुषमा स्वराज का स्वभाव स्मृति जुबिन ईरानी को आईना दिखता है। तीन दिन पहले विदेश मंत्रालय की प्रेस वार्ता शुरू करते समय अधिकारियों ने कहा कि पत्रकारों को सवाल-जवाब करने के लिए एक घंटे का समय दिया जाएगा। जो पत्रकार सवाल पूछना चाहते हैं वो हाथ खड़े करें, लेकिन सभी का सवाल नहीं लिया जाएगा। लगभग सभी पत्रकारों ने हाथ खड़े कर दिए, इसी बीच सुषमा स्वराज ने कहा कि जितने भी हाथ खड़े हैं, सभी के लिए सवाल लिए जाएंगे । इसके बाद शुरू हुआ सवाल-जवाब का सिलसिला डेढ़ घंटे से ज्यादा चला, और विदेश मंत्री ने विनम्रता से सभी के सवालों को सुना और जवाब दिया। सवाल उनकी व्यक्तिगत जीवन से लेकर कूटनीतिक, राजनीतिक, विदेश दौरा और पीएम मोदी के कैबिनेट पर हावी रहने पर था, लेकिन सभी सवालों का सुषमा ने जितनी सहजता से और बिना अपने अधिकरियों से सलाह लिए जवाब दिया, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। अक्सर कूटनीतिक मामलों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है, ज्यादातर सवाल मंत्री से पूछे जाते हैं, और जवाब अधिकारी देते हैं। साथ समय की पाबंदी भी होती है। लेकिन यहां सब कुछ अलग था। 

दूसरी तस्वीर स्मृति जुबिन ईरानी की,
12वीं पास ईरानी छोटे परदे से निकलकर बीजेपी में शामिल हुईं और 2014 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा जिसमें उन्हे अमेठी की जनता ने हार का ताज पहनाया। भारतीय लोकतंत्र के रंगमंच की यहीं सबसे बड़ी खूबी है कि यहां स्टेज पर मौका सबको मिल जाता है, चाहे वो कलाकार हो या ना हो।
ठीक स्मृति ईरानी को भी हार के बावजूद नरेंद्र मोदी कैबिनेट में सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय मिला । दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर दिनेश सिंह से शुरु हुआ उनका विवाद आईआईटी, एनआईटी नागपुर, शिक्षा नीति, तमाम नियुक्तियों में सामने आया और आ रहा है। कल जो आज तक चैनल के कार्यक्रम में घटना घटी को ईरानी के तर्क करने की शक्ति, पूछे गए सवालों के जवाब के बजाए हंगामा, और अनर्गल आरोप लगाकर अपने आप को स्त्री और मंत्री के रुप में  श्रेष्ठ करने से ज्यादा कुछ नहीं है। जहां तक मैं जानता हूं, आज तक के अशोक सिंघल एक संजीदा पत्रकार हैं, उन्होने अपने कार्यक्रम में स्मृति ईरानी से ये सवाल पूछा कि ,
नरेंद्र मोदी ने आपके अंदर ऐसा क्या देखा जो आपको मानव संसाधन मंत्री बना दिया। स्मृति चाहती को सवाल को जवाब बहुत साधारण शब्दों में दे सकती थी । लेकिन इसके बजाए उन्होने हंगामा खड़ा करना ज्यादा मुनासिब समझा। उन्होने अशोक सिंघल के सवाल का इंटरपिटेशन ठीक वैसा किया जैसे कोई गंवार करता । उन्होने इस को खुद के स्त्री होने से जो दिया। और बार वहां मौजूद पब्लिक को सुनाया। जिस अंदाज में वो अशोक सिंघल के सवालों को जनता से बार-बार सुना रही थीं, उससे साफ दिख रहा है, कि मकसद स्टूडियो के अंदर अराजकता फैलाने कम कुछ नहीं था। दरअसल, ये सामान्य सी बात है कि जब हम अपने बचाव में उचित तर्क नहीं रख पाते हैं, तब हम हंगामा करते हैं, चिल्लाते हैं, और अराजकता का रास्ता अख्तियार करते हैं।  और यहीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी कर रही हैं। 2014 में तैयार हुए भक्तों का भी यहीं हाल है।

रविवार, 24 मई 2015

झीरम घाटी का नरसंहार


 25 मई 2013, दो साल पहले इसी दिन छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के झीरम घाटी में सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ था। चुनावी रैली के लिए जा रहे कांग्रेस नेताओं के काफिले को नक्सलियों ने घेर लिया था और ताबड़तोड़ गोलीबारी में कांग्रेस के 29 नेता मारे गए थे। सलवा जुडुम से जुड़े महेंद्र कर्मा, वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल समेत 29 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
 नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और उनके बेटे को बहुत ही बेरहमी से मारा था । उनके नफरत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होने महेंद्र कर्मा के शरीर को चाकुओं और गोलियों से छलनी कर दिया था। नंद कुमार पटेल के बेटे दिनेश की खोपड़ी को तरबूज की तरह जगह-जगह से चीर दिया गया था। मैं छत्तीसगढ़ में 11 महीने तक रहा उस दौरान की ये वहां की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। हमले के बाद छत्तीसगढ़ का माहौल काफी खराब हो गया था। हमारे न्यूज़ रूम से लेकर सड़कों तक ये चर्चा हो रही थी कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजीत जोगी ने कांग्रेस के नेताओं को मारवाया है। कुछ अख़बारों ने अजीत जोगी की तरफ इशारा करते हुए ख़बरें भी छापी थी हालांकि किसी ने भी किसी का नाम नहीं छापा था। उस दौरान एक चर्चा ये भी थी कि रमन सरकार अगले 24 घंटे में गिर जाएगी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाएगा क्योंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है। बहरहाल, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और थोड़े दिनों बाद बात आई-गई हो गई। नक्सली हमले में जवानों के मारे की ख़बरें सुनने वालों को पहली बार अपनों के मारे जाने पर ग़म ज़रुर था, लेकिन वहां के लोग अब इसके भी आदि हो गए हैं।

अब बात जांच की

देश में पहली बार नेताओं पर इतने बड़े नक्सली हमले से छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरा देश स्तब्ध था। राज्य की रमन सरकार ने बिलासपुर हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय आयोग का गठन किया गया, जो अभी जांच कर ही रहा है । इधर, केंद्र की मनमोहन सरकार ने NIA को जांच सौंपा, शुरूआत में NIA ने बहुत तेजी से जांच की, हमारे संपादक महोदय से NIA ने करीब 2 घंटे से ज्यादा तक पूछताछ की और वीडियो फुटेज लिए, क्योंकि इस हमले की ख़बर सबसे पहले हमारे रिपोर्टर नरेश मिश्रा ने ही दी थी और वही एक मात्र ऐसा रिपोर्टर थे जो नक्सलियों की फायरिंग के बीच घटनास्थल पर पहुंचे थे। NIA की जांच चल ही रही थी कि फिर ये ख़बर उड़ी की अजीत जोगी का नाम हमले में आ रहा है, लेकिन कुछ दिनों बात ये भी ख़बर आई-गई हो गई, और आज तक NIA की जांच चल ही रही है। उम्मीद आगे भी चलती रहेगी।


इस घटना से जिस एक बात को लेकर मैं परेशान हुआ वो ये कि इतनी बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं की हत्या के बाद भी केंद्र ने ना ही नक्सलियों के खिलाफ कोई बड़ा अभियान चलाया, ना ही राज्य सरकार के खिलाफ कोई एक्शन लिया गया और ना ही अपनी 'सशक्त' एजेंसियों से मामले की एक समय सीमा के भीतर जांच करवाई गई ।


शनिवार, 24 जनवरी 2015

CHAVANNI KI VIDAI ( चवन्नी की विदाई)

HISTORY OF ASSEMBLY ELECTION OF UTTAR PRADESH

SCRIPT BY: RAVI CHAND
VOICE OVER: NIKHIL
EDITOR: VINOD

'MAFIYA' PANCHAYAT PRESIDENT IN CHHATIGHAR

SCRIPT BY: RAVI CHAND
VOICE OVER: MOHIT

'MAHIYA' POLITITION IN MADHYA PRADESH


SCRIPT BY: RAVI CHAND
VOICE OVER: MOHIT
EFITOR: VINOD

CURRUPTION IN ''NIRMAL GRAM YOJANA'' IN MADHYA PRADESH

SCRIPT BY RAVI CHAND
VOICE OVER: ANIMESH DAS
EDITOR: VINOD

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

'आग' आज अपने घर में लगी

'आपके पड़ोसी पर अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं तो कल आपके उपर भी अन्याय होगा' शिवखेड़ा की ये लाइने दिल्ली में अक्सर ऑटो के पीछे पढ़ने को मिल जाती हैं। आज अन्याय मेरे साथ भी हुआ। दिल्ली ट्रांजिट की बस में स्कूल की वर्दी में सवार कुछ चोरों ने मेरा मोबाइल फोन चुरा लिया । जब मुझे इसका पता तो मेरे पास पछताने के सिवाय कुछ नहीं था...मैं एक जगह खड़ा होकर दूर तक उस बस निहारता रहा...लेकिन अफसोस के सिवाय कुछ कर नहीं सकता। प्रयास किया कि उस बस तक पहुंच जाऊ, इसके लिए एक ईको गाड़ी को हाथ दिया उसने गाड़ी स्लो.. किया मैं उससे अपनी समस्या सुनाई और बस तक छोड़ने को कहा...लेकिन वो नहीं छोड़ा..और चल दिया। खैर, रोज मैं बदरपुर से बस में सवार होकर नोएडा आता हूं, कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब बस में किसी न किसी यात्री का मोबाइल, पर्स चोरी न होता हो। स्कूल की वर्दी छोटे-छोटे बच्चे बस में सवार होते हैं, और लोगों के जेब काटते हैं। चूंकि वो स्कूल की वर्दी में होते हैं इसीलिए लोग शक भी नहीं करते और उनकी जेब कट जाती है। कल भी मेरे जैसे एक लड़के का काफी महंगा मोबाइल चोरी हो गया था। पिछले आठ साल से दिल्ली में रहता हूं, ये तीसरी बार है जब मेरा फोन चोरी हुआ है। इससे पहले जब भी चोरी हुआ तब चोरी करने वाले उम्र में कुछ बड़े चोर होते थे। लेकिन मैं पिछले एक साल से देख रहा हूं बस में पॉकेटमारी के ट्रेंड में बदलाव आया है, अब बसों में ज्यादा उम्र के युवक चोरी करते हुए नहीं दिखते, अब स्कूल की वर्दी में सवार छोटे-छोटे बच्चे झुंड बनाकर बसों में चढ़ते हैं और पॉकेट काटते हैं। चूंकि ज्यादा वास्ता बदरपुर रूट से होता है, तो मैं प्रतिदिन ये देखता हूं । यहां स्कूल की स्टैंड से बच्चे बस में सावर होते हैं...और किसी न किसी को अपना शिकार बनाकर अगले दो-तीन स्टैंड बाद उतर जाते हैं।मेरे दो मित्र इन स्कूल में अध्यापक हैं, वो बतातें हैं कि स्कूल की छतों पर दर्जनों खाली पर्स पड़े है, इसके अलावा बीयर,शराब की बोतले भी पड़ी रहती हैं। ये बच्चे स्कूल के भीतर नशा भी करते हैं। मेरे मित्र ने मुझे ये भी बताया कि ये बच्चे स्कूल के अंदर ही कई तरह के अनैतिक काम भी करते है। इनके चोरी करने का चाहे जो भी कारण हो, लेकिन पहली नजर में शौक पूरा से ज्यादा मुझे कुछ नहीं दिखता। अंत में भगवान इन्हे सद्बुद्धि दें..

सोमवार, 29 जुलाई 2013

'स्वर्ग' में मौत का तिलिस्म


धरती के स्वर्ग जम्मू कश्मीर में हमेशा स्थानीय लोगों और सेना, पुलिस के बीच टकराव होता रहता है। झड़प में मौत फिर, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, कश्मीरी युवाओं की दिल्ली केंद्र से बढ़ती दूरी, सरकार की उदासीनता सहित तमाम बातें की जाती है। कभी-कभी मुझे ये लगता का देश की जनता को गुमराह राजनीतिक जमात ही नहीं बल्कि हमारे देश के ताथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों का वर्ग भी करता है। एक बार फिर शांत सा रहने वाला चिनाब क्षेत्र सेना और उपद्रवियों के कारण अशांत हो गया है। 17 जुलाई की दरमियान रात में स्थानीय लोगों और बीएसएफ के जवानों के बीच झड़प, फिर दूसरे दिन सुबह करीब 6 बजे पुलिस और बीएसएफ की फायरिंग में चार प्रदर्शनकारियों की मौत से पूरे रामबन जिले के गूल इलाके में तनाव है। अक्सर कश्मीर मुद्दे पर लिखने वाले पत्रकार शुजात बुखारी रामबन जिले के गूल में हुई घटना को संदर्भ में रखते हुए नई दुनिया में 24 जुलाई को लिखते है कि "राजनीतिक अधिकार के अभाव में एक कश्मीरी आज खुद को दिल्ली से बहुत फासले पर महसूस करता है। वह मानने लगता है कि दिल्ली की हुकूमत को उसकी परवाह नहीं है, और खुद ही नहीं चाहती की घाटी की समस्याओं का कभी अंत हो। अलग-थलग कर दिए जाने की भावना आम कश्मीरियों के मन में गहरे पैठी हुई है।" अपने पूरे लेख में उन्होने इस तरह की हालातों के लिए केंद्र को जिम्मेदार और कश्मीरियों की दिल्ली की बढ़ती अनदेखी का जिक्र किया है। पूरे लेख में कहीं भी कश्मीर सरकार की किसी भी तरह की जिम्मेदारी नहीं दिखाई गई है, लेख ऐसा है जैसे कश्मीर में कोई सरकार नहीं है बल्कि सब कुछ दिल्ली से होता है। खैर, वो ही नहीं उनके जैसे तमाम लोग इसी तरह का विचार रखते है। लेकिन कई बार परिस्थितियां कुछ और होती है, और उसका चित्रण कुछ अलग तरीके से किया जाता है। रामबन के गूल में हुई ताजा घटना इसका उदारहण है। दरअसल, 17 जुलाई की रात करीब 9 बजे बीएसएफ की एक टुकड़ी धरम चेक पोस्ट पर रूटीन गश्त पर थी। सेना को रास्ते में एक व्यक्ति मिला जिसका नाम मोहम्मद लतीफ था वो एक स्थानीय मस्जिद में इमाम बताया गया। शक के आधार पर जवानों ने उससे उसका परिचय पूछा, जिसे वो देने की बजाय उन जवानों से उलझ गया। बात आई-गई हो गई। लेकिन सेना के मुताबिक थोड़ी देर बाद वो शख्स अपने कुछ समर्थकों, जवान लड़कों और बच्चों के साथ बीएसएफ के कैंप के पास आकर हंगामा करने लगा। सेना ने स्थानीय पुलिस और प्रशासन के बुलाया रात में बात सुलट गई। लेकिन दूसरे दिन सुबह करीब 400-500 स्थानीय लोग वहां आ धमके, और बीएसएफ कैंप पर पत्थरबाजी करने लगे। भीड़ से किसी ने फायरिंग भी कि जिससे बीएसएफ के करीब 9 जवान घायल हुए। जिनमें से कईयों को गोली भी लगी थी। जबावी कार्रवाई में स्थानीय पुलिस और सेना की तरफ से भी फायरिंग हुई जिसमें चार प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। मरने वालो में फारूख अहमद शाह था जो एक गरीब परिवार से था, एक अपाहिज बीवी और दो बच्चों के साथ रहता था, दूसरे मंसूर अहमद खान थे, जो राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक थे, और दो बच्चे थे जिनकी मौत सेना की गोलीबारी हुई थी। घटना के बाद पूरे कश्मीर में हालात तनावपूर्ण हो गए। अलगाववादी नेताओं के लिए तो जैस वसंत का मौसम आ गया, जेकेएलएफ के चेरयमैन यासीन मलिक, अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और हुर्रियत के नेता मीरवाइज उमर फारूख अपने-अपने घरों से निकले और कश्मीर बंद का एलान कर दिए। अपने समर्थकों को इक्ट्ठा कर इन लोगों ने सेना के जवानों पर पत्थबारी करवाया, जबरन लोगों से दुकानों के शटर बंद करवाया। इन सभी उपद्रव में पीडीपी का भरपूर समर्थन था। मृतक राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मंसूर अहमद शान के भाई और पीडीपी नेता इंम्तियाज हुसैन शान का आरोप है कि मंसूर की मौत सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद अफजल वानी के गोली चलाने से हुई है। जिस समय घटना हुई उस दौरान अफजल वानी धरम इलाके में सनगादन चौकी के प्रभारी थे। प्रदर्शनकारी चौकी के आस-पास विद्रोह कर रहे थे। इंम्तियाज हुसैन का आरोप है कि सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद अफजल वानी गूल से कांग्रेस विधायक अजाज अहमद खान के नजदीकी है, अजाज राज्य सरकार में वाणिज्य राज्य मंत्री है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है इन दोनों परिवारों ( मृतक प्रोफेसर मंसूर अहमद शान और सब इंस्पेक्टर मोहम्मद अफजल वानी) में पहले से ही आपसी राजनीतिक रंजिश चली आ रही है। मृतक प्रोफेसर मंसूर की बहन शमशादा साल 2008 में पीडीपी के टिकट पर चुनाव लड़ी थीं। इसके बाद उन्होने नेशनल कांफ्रेस ज्वाइन कर लिया। घटना के राजनीतिक विरोध को देखते हुए उमर अब्दुल्ला की सरकार ने सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद अफजल वानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करते हुए उन्हे उनके मूल निवास गूल से बाहर भेज दिया है। इन सब तथ्यों के बावजूद पत्रकार, बुद्धजीवी, तथाकथित सिविल सोसाइट और तमाम एनजीओ केवल दिल्ली की सरकार और सेना को दोषी ठहराते है। साथ ही मौके की ताक में बैठे अलगावादी तत्व इलाके में हर कीमत पर स्थितियों को असामान्य करने की कोशिश करते है। ये लोग किसी भी घटना को ऐसा रुप दे देते है जिससे हालात सामान्य होने में महीनों लग जाते है। इन लोगों के द्वारा सेना को जानबुछकर उकसाया जाता है, फायरिंग और पत्थरबाजी की जाती है। अपने घरों में बैठे ये लोग गरीब लोगों, युवाओं को धार्मिक उन्मादी बनाकर सड़क पर उतारते है, उन्हे मरने के लिए उकसाते है, और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते है। इसी मौसम में बरसाती मेंढक की तरह बुद्धिजीवी भी अपने घरों से बाहर निकते है, और कश्मीरी युवाओं की दिल्ली से बढ़ती दूरी का दार्शनिक शास्त्र पेश करते है, और इन सभी में जम्मू कश्मीर सरकार की मौन सहमति होती है। मेरे समझ में आज तक ये बात नहीं आई कि जम्मू काश्मीर का युवा क्यों दिल्ली से फासले पर महसूस करता है, जबकि वहां एक लोकतांत्रिक चुनी हुई सरकार है, राज्य का अपना वित्तीय बजट है, इसके आलावा भी हर साल केंद्र से हजारों करोड रुपए दिए जाते। जम्मू काश्मीर के लोगों को नौकरियों में विशेष रियायत भी दी जाती है। देश के दस सर्वाधिक विकसित राज्यों में जम्मू काश्मीर एक है। मानव विकास सूचकांक में भी जम्मू कश्मीर का अच्छा स्थान है। लेकिन इसके बाद भी जब-जब जम्मू कश्मीर में प्रदर्शन होते है, सेना-स्थानीय लोगों में झड़प होती है, लोग मारे जाते तो विकास का मुद्दा उठाया जाता। ये राग अलापा जाने लगता है कि यहां के युवा दिल्ली से अपने आप को अलग-थलग पाते है। मुझे लगता है जम्मू काश्मीर से ज्यादा गरीब भारत के अन्य राज्य है लेकिन उन राज्यों में विद्रोह नहीं होता। होता भी है तो वहां के युवा दिल्ली से नहीं बल्कि उस राज्य अपने हाक की मांग करते है। परंतु जम्मू काश्मीर में ऐसा नहीं होता। ताज्जुब की बात तो ये है कि कभी कोई जम्मू काश्मीर का आम युवा सामने आकर ये नहीं कहता कि वो दिल्ली से दूरी महसूस करता है। हां जो सामने आता है वो देश में आईएएस की परीक्षा टॉप कर जाता है।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

वोट बैंक की नहीं, डेवलपमेंट की राजनीति करें नेता -मोदी

अमेरिका बूढ़ा हो चुका है। यूरोप बूढ़ा हो चुका है। चीन बूढ़ा हो चुका है, लेकिन हिन्दुस्तान जवान हो रहा है । ये वक्त है इस जवान हिन्दुस्तान की ताकत का उचित उपयोग करने का इसका उपयोग वोट बैंक की नहीं, डवेलपमेंट की राजनीति में किया जाना चाहिए, नकारात्मक नहीं, सकरात्मक राजनीति में करना चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉर्मस में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये संदेश भारतीय राजनीतिज्ञों और युवाओं को दिया। हालांकि यही युवा मोदी के विरोध में कॉलेज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। बतौर मुख्य अतिथि मोदी एक राजनेता की छवि के साथ अपना भाषण दे रहे थे। गुजरात के विकास मॉडल की पुरजोर सराहना करते हुए मोदी अपने भाषण में आज के गुजरात की तुलना वर्तमान के भारत के साथ करने में कोई कसर नहीं छोड़े। कही भी मोदी ये बताने से नहीं चूके की उनका गुजरात सर्वश्रेष्ठ है। मोदी ने कहा कि मैं जिस जगह से आया हूं वहां गांधी और सरदार बल्लभभाई पटेल जैसी दो विचारधाएं है। उन्होने कि आज़ादी के साठ साल बाद भी हमें केवल स्वराज मिला है सुराज अब तक हासिल नहीं हो पाया। देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्र के महाविद्यालय में मोदी ने छात्रों को अर्थशास्त्र के साथ-साथ समाजशास्त्र का पाठ भी पढ़ाया, लेकिन गुजरात की ग्लोबल होती सोच ही ज्यादतर हावी रही। विचारकों, विद्वानों की भांति अपना व्याख्यान देते हुए मोदी ने जोर देकर कहा हम क्यों मेड इन इंडिया में असफल है। क्योंकि हमने स्किल, स्केल और स्पीड नाम की जो एक चीज थी, उसे खो दिया है। हमारे देश में एक निराशा का माहौल बना है। जिसमें सब के सब डूबते जा रहे है। आशावादी विचारधारा का अंत हमारे देश को पिछड़ेपन की गर्त में ले जा रहा है। स्किल, स्केल और स्पीड के साथ मोदी ने कहा कि हमें पैकेजिंग का भी उतना ही ध्यान रखना होगा जितना कि उत्पादन पर। पैकेजिंग पर जोर देते हुए मोदी ने कहा कि हमारी पैकेजिंग ऐसी होनी चाहिए जिससे दुनिया मेड इन इंडिया के नाम से कोई सामान उठाने में संकोच न करें। उदाहरण देते हुए मोदी ने कहा कि एक वक्त था जब हिन्दुस्तान में लोग मेड इन जापान नाम से किसी भी चीज को उठाने में कोई संकोच नहीं करते थे। एक वक्त था जब लोग ये नहीं देखते थे की ये प्रोडक्ट किस कंपनी में बना है। बस वो देखते थी कि उस पर मेड इन जापान लिखा है या नहीं। आज वही वक्त आ गया जब हिदुस्तान की युवा पीड़ी अपने बलबूते इस काम को पूरा कर सकती है। मोदी ने युवाओं को अपनी एक अलग विचाराधारा की वकालत करते हुए कहा कि मेरे हाथ में जो गिलास है इसे देखकर आपमें से कई युवा कहेंगे की ये पानी से आधा भरा हुआ है, कई लोग कहेंगे की आधा खाली है। लेकिन मैं तीसरी विचारधारा का व्यक्ति हूं। मेरी नजर में ये गिलास आधा पानी से भरा है और आधा हवा से और इस प्रकार गिलास पूरा भरा है। अपने आशावादी सोच को बताते हुए मोदी ने कहा कि मेरा देश, जिसे लोग स्नेक चार्मर कहते थे। वो आज "माउस चार्मर" बन गया। जिसके कर्ताधर्ता हमारे देश के बीस और बाइस साल के नौजवान है। एक तरह से मोदी इन युवा भारत के इन नौजवानों से संवाद करते दिखे, जो देश के बहुत ही कम राजनेताओं में देखा जाता है। अधिकतर राजनेताओं की छवि नौकरशाहों द्वारा लिखे भाषणों को रटने की होती है। लेकिन इससे इतर मोदी ने अपने भाषण के बीच-बीच में रुककर छात्रों से ये जानना भी चाहा कि उनको भाषण कैसा लग रहा है। मोदी ने बिना किसी हिचक के छात्रों से पूछा कि क्या भाषण कंटीन्यू रखूं या बहुत है। छात्रों में उत्साह देखते बना, जोर देकर छात्रों ने मोदी को भाषण जारी रखने को कहा। कॉलेज के मंच से छात्रों को संबोधित करते हुए मोदी ने केवल हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि दुनिया को बताने की कोशिश की उनका गुजरात क्यों सर्वश्रेष्ठ है। अपने विकास के ट्रीपल मॉडल का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि हमने गुजरात में विकास का ऐसा ढांचा खड़ा किया जो समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलता है। कभी कॉटन के क्षेत्र में मैनेचेस्टर कहे जाने वाले गुजरात के बारे में मोदी ने कहा कि हमने कॉटने के विकास के लिए गुजरात में फार्ममर टू फैक्ट्री, फैक्ट्री टू फैशन, फैशन टू वल्र्ड की नीति अपनायी है। जिसके कारण गुजरात में 2001 में कॉटन का उत्पादन 21 लाख गाठ था वो आज 21 करोड़ गाठ से ज्यादा हो गया। केंद्र पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि कोरिया जैसा देश ओलंपिक का शानदार आयोजन करके दुनिया को अपनी शक्ति का एहसास करा दिया। जापान में ओलंपिक आठ साल बाद होने है लेकिन उसने अभी से अपने देश में ऐसे माहौल पैदा कर दिया कि लोगों उत्साह का माहौल भर गया भारत में न जाने किसलिए कॉमनवेल्थ का आयोजन हुआ था। करीब तीन घंटे तक अपने भाषण में मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रुप में नहीं बल्कि एक राजनेता के रूप में ज्यादा बोलने की कोशिश कर किए। उन्हे भी लग रहा था कि वो एक ऐसे समय में उन युवा छात्रों को संबोधित कर रहे है जब तमाम सर्वे 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में मोदी को पीएम के रूप में एक बेहतर विकल्प देख रहे है। पिछले कुछ दिनों में बीजेपी की अंदरूनी सत्ता से लेकर आम लोगों में भी मोदी की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है। इसी का नतीजा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी नैया पार लगाने के लिए बीजोपी मोदी राग अलाप रही है। अंतत: मोदी ने अपना भाषण समाप्त करते हुए फिर कहा कि मै आशावादी हूं और इस गिलास को पूरा देख रहा हूं और आप भी ये देखना शुरू कर देंगे उस दिन पूरी दुनिया में मेड इन इंडिया डंका होगा।

बुधवार, 14 नवंबर 2012

क्यों उजाला करूं...

इस छोटे से रास्ते में अंधेरा कर दिया मैंने कई जगह कभी बेवजह कभी स्वाभिमान से कभी अपनी जरूरतों के लिए सोचता हूं, आज क्यों न उजाला कर दूं पर क्यों करूं अंधेरा ग़लत तो नहीं है मेरी आत्मा कहती है मुझसे। मेरा स्वाभिमान आड़े आता है रोड़ा बन जाता है, हर उस सफ़र में जिसे मैंने पीछे छोड़ दिया मै ख़ुद को कहता हूं, पीछे क्यों बढ़ना तो मुझे आगे है चाहे कुछ हो जाए, पर मेरा स्वाभिमान न डगमगाए मैं इससे हर वक्त डरता हूं पर अपने कर्तव्य पथ पर हर वक़्त अडिग रहता हूं। रविचंद

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

ट्रेनों के जनरल डिब्बों में वेंडरों और पुलिस की अराजकता

दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल से बिहार सप्त क्रांति सुपर फास्ट दोपहर के 2.55 मिनट पर प्लेट फॉर्म नंबर एक से बिहार के मुजफ्फरपुर के लिए रवाना हो गई। मुझे उस दिन (31 अक्टूबर को ) अचनाक अपने घर गोरखपुर निकला था, सो मैं जनरल का टिकट लेकर ट्रेन के सबसे पीछे लगे जनरल डिब्बे के दूसरी बोगी मैं बैठ गया। हर बोगी में एक सीट रेलवे के रसोईयों ( कटैगरिंग सुविधा- 'खाने पीने सुविधा' उपलब्ध कराने वालों के लिए आरक्षित होता है)। अपने करीब 13 घंटे के यात्रा के दौरान मैंने भ्रष्टाचार, दलाली, और अराजकता के कुछ ऐसे दृश्य देखें उन दृश्यों का शब्दों में वर्णन है ये लेख। ट्रेन के जनरल बोगी में अपने निर्धारित सीट पर खान-पान का डिब्बा रखते ही लक्ष्मी शाह और उसका साथी कहते है ये आगे पीछे का तीन सीट खाली कर दों। तुरंत खाली करों, नहीं तो सबकों सौ-सौं रुपए देने होंगे। और साथ में खाना-पीना भी होगा। थोड़ी देर में उसने अपने आगे-पीछे की तीन सीटे तीन लोगों को सौ-सौ रुपए में बेच दी। जबकि उनके पास टिकट भी था। एक आदमी जिसके पास टिकट नहीं था और उसे मुजफ्फरपुर जाना था, उसे उसने 500 सौ रुपए में सीट बेचीं। मिलीभगत का कमाल देखिए सप्त क्रांति मुरादाबाद से होकर लखनऊ जाती है, आनंद बिहार टर्मिनल से प्रस्थान करने के बाद मुरादाबाद के करीब टीटी उस बोगी में टिकट चेक करने आए। उस समय वेंडर भी वहीं पर बैठा था। वेंडर के सीट के पास दो लोग मुजफ्फरपुर जाने के लिए बैठे थे, जिनमें से केवल एक के पास ही टिकट था। टीटी ने दोनों से पूछा कहां जाओंगे ,टिकट दिखाओं उन यात्रियों के बोलने से पहले ही वेंडर बोला, एक मुरादाबाद जाएगा (जिसके पास टिकट नहीं था, और दूसरा मुजफ्फरपुर जाएगा)। फिर टीटी पूछा इसका टिकट ,,,अरे सर स्टाफ है। टीटी चला गया। थोड़ी देर बाद टीटी थोड़ी देर बाद ट्रेन में सामान बेचने वाले को हमारी बोगी में भेजा, और उससे कहा कि वेंडर से पानी लेकर आना, वो आदमी वेंडर से पानी लेकर गया। बिना पैसे के। अब वेंडर कहता है आप लोग देखिए हमें भी यहां बहुत कुछ गवाना होता है, अगर मै आपसे इस सीट के बदले पैसे नहीं लूंगा तो इनकों पानी कहां से मुफ्त में पिलाऊंगा, अभी तो ये शुरूआत है मुजफ्फपुर तक कई बोतल पानी और खाना मुफ्त में ये लोग खाते है, कहां से लाऊंगा इतना माल। इसीलिए इन सीटों पर हम लोगों को बिठा कर पैसे लेते है। रात के 9 बजे ट्रेन के प्रस्थान करने के बाद ही वेंडरों ने शराब पीना शुरू कर दिया। करीब तीन बोतल शराब पीने के बाद वो चिल्ला चिल्लाकर कह रहा था मेरे बोगी में जितने लोग बैठ है.. ध्यान से सुन लिजीए.. सबकों खाना खाना होगा। अपने सामने वाले सीट पर बैठे यात्री से वेंडर कहता है, देखिए मेरा तो वसूल है, मेरे बोगी में जो बैठता है उसे खाना खाना ही पड़ता है। और देखिए, इधर तो हम खाना खिलाने का ही पैसा लेते है, लेकिन जब बिहार से ये ट्रेन लौटती है, तो सबसे 100-100 रुपए जबरदस्ती लेते है, और तभी अपनी बोगी में बैठने देते है। ये सभी बाते वेंडर खुद कह रहा था। शराब का नसा चढ़ने के बाद वेंडर का होश खो गया, लखनऊ स्टेशन आने के पहले करीब 8 बजकर 50 मिनट पर वो उठा, और कहा हां भईया खाने के लिए तैयार हो जाइए। अब वो अपने हाथ में खाना लेकर सबको जबरन देने लगा, ठीक उसके ही रो में मैं उपर की सीट पर बैठा था। नीचे के सभी लोगों को जबरन खाना देने के बाद उपर खाने का प्लेट बढ़ाया। सबसे पहले उसने मुझे दिया, मैंने उसका खाना खाने से मना कर दिया। मैने वेंडर से कहा मैं अपने घर से खाना लेकर आया हूं, मुझे खाना नहीं चाहिए। उसने कहा नहीं खाना खाना हीं पड़ेगा, मैंने वेंडर से कहा मुझे नहीं खाना जबरन खिलाओगे क्या? फिर उसने मेरे कान में कहा बाबूजी ये खाने का प्लेट रख लीजिए आप नहीं लेंगे तो कोई भी नहीं लेगा क्योंकि मैने उपर खाना देने की शुरूआत आपसे ही की है। फिर मैने उससे कहा नहीं चाहिए मुझे खाना, और सब लेंगे या नहीं लेंगे इसकी जिम्मेदारी मेरी है क्या, जिसे खाना होगा वो खाएगा, जिसे नहीं खाना होगा वो नहीं खाएगा, तुम जबरन खाना तो नहीं खिला सकते न, मैंने वेंडर से कहा। फिर वो कहता है बाबूजी आप मेरे पेट पर लात मार रहे है, मैंने कहा ऐ कैसी बात कर रहे हो, इसमें लात मारने की क्या बात है, नौकरी करते हो, जितना बिकेगा उतना बेचों। नहीं बिकेगा वापस कर देना। ( दरअसल उन्हे पर डिब्बा बेचने पर कमीशन मिलता है जिससे वो लोगों को जबरन खाना खिलाकर उल्टा सीधा पैसा लेते है)। मैने जब डिब्बा लेने से इनकार कर दिया तो उसने मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग आदमी को डिब्बा पकड़ाया, उसने कहा मुझे नहीं खाना मेरे पास खाना है, वेंडर ने उससे कहा क्यों नहीं खाएगा, चल पकड़ ये डिब्बा, नहीं तो भाग जा इस बोगी से, मेरे कहे मुताबिक उस बुजुर्ग व्यक्ति ने हिम्मत बांधा और वेंडर का खाना खाने से इनकार कर दिया। फिर एक के बाद एक आठ लोगों ने जो मेरे साथ उपर की सीट पर बैठे थे। खाना खाने से इनकार दिए। अब वेंडर आगबबूला होकर मेरे से कहता है ये आपने अच्छा नहीं किया...आपके कारण इन लोगों ने खाना नहीं लिया। आपकों देख लूंगा मैं। इतना कहकर वेंडर दूसरी सीट पर चला गया। जबरदस्ती की हद पूरे बोगी में उसने हमारी सीट को छोड़कर सभी को जबरन खाना खिलाया। कई बुजुर्ग व्यक्ति को जो खाना लेने से मना कर रहे थे, उनको थप्पड़ मारकर जबरन खाना दिया। और पैसे उसूल किया। लखनऊ स्टेशन पर रिश्वत की मिलीभगत लखनऊ स्टेशन पर ट्रेन करीब 20 मिनट रूकती है। ट्रेन रूकने पर मैं थोड़ी देर के लिए ट्रेन से नीचे उतर गया। और यहां पर जो दृश्य देखा वो दंग कर देने वाला था। दरअसल यहां से वेंडर अपना खाना बेचकर अपने कैंटिन वाली बोगी में सोने चले जाते है। मै अपने बोगी से नीचे उतकर थोड़ी दूर पर ही खड़ा था। तभी देखा की दो पुलिस वाले ( हृद्य नारायण दुबे 'वर्दी पर एक स्टार लगा हुआ', और दूसरा उनके साथ बृजलाल नाम का पुलिस वाला था) हमारे बोगी में झांक रहे थे, तभी वेंडर दौड़ कर उन पुलिस वालो के पास आया । और पुलिस उन पुलिस वाले से कहता है, सर जी नमस्कार, इसी बोगी में जाना है क्या, पुलिस वाले ने कहा कि नहीं इसमें नहीं जाना बता क्या बात है। वेंडर बोला अरे सर एक अपना ही भाई बैठा है उसके पास टिकट नहीं है... थोड़ा देख लीजिएगा। हृद्य नारायण दुबे अपने दूसरे पुलिस साथी से कह रहा है कि ..अरे ये लोग चार पांच लोगों को पैस लेकर सीट पर बिठाते है। अरे बहुत कमाते है ये लोग। फिर वेंडर पुलिस वालों से कहता है अरे माई-बाप कहां ..आज तो देख रहे है.. पूरी बोगी ही खाली है। खाना भी नहीं बिका, क्या बताऊं काफी दिनों बाद आज बहुत बुरा हाल है। पुलिस वाला कहता है अरे...साले तुम लोग बहुत चालबाज आदमी हो। इसके बाद वेंडर पुलिस वालो से थोड़ी दूर जाकर अपने जेब से एक सौ रूपए का नोट निकालता है, और उनके पास आकर बृजलाल नाम के पुलिस वाले के जेब वो सौ का नोट रख देता है। और उनसे कहता है सर थोड़ा देख लीजिएगा उसे कोई दिक्कत न हो। फिर पुलिस वाला कहता है अरे हम तुमसे कुछ कह रहे है, जाओं निश्चिंत रहो।

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

सम्मेलनों में फंसा जैव विविधता संरक्षण

हम जैव विविधता संरक्षण के लिए 60 मिलियन डॉलर देने की घोषणा करते है, हमें ये बताते हुए खुशी है कि हमारी सरकार ने जैव विविधता को बचाने के लिए कई सारे उपाय किए है...जिसमें मनरेगा जैसी योजनाएं प्रमुख है...भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने ये बातें अक्टूबर 2012 में हैदराबाद में आयोजित विश्व जैवविविधता सम्मेलन में कही थीं । दुर्भाग्य से बायोडायवर्सिटी में सबसे ज्यादा संपन्न हमारे देश में तमाम नृजातीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है। इसे आप आधुनिकता की हवस कहे या प्रकृति की मार, जिस समय हैदराबाद में विश्व समुदाय जैव विविधता को बचाने की खातिर माथापच्ची कर रहा था, उसी समय असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में कई गैंडे और पशु-पक्षी प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ शिकारियों के शिकार हो गए। इसे विडंबना कहे या परंपरा.... भारत की पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने काजीरंगा में आए प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए सिर्फ एक करोड़ रुपए देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली....बिना किसी दूरदर्शी नीति और योजना के इसी तरह सरकार करोड़ों रूपए लुटा देती है..... लेकिन ये कोशिश जैव विविधता को बचाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है...... हैदराबाद में जैवविविधता सम्मेलन एक ऐसे समय आयोजित किया गया , जब दुनियाभर की जैविक प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है....लेकिन इस बाजारू दुनिया का प्रकृति के प्रति नजरिया देखिए.... यहां भी कार्पोरेट जगत की तरह केवल पैसे जुटाने की चर्चा हुई...जिसे तमाम गैर सरकारी संगठन, औऱ दुनियाभर की सरकारों के रहनुमा मिलकर लूट सकें। आधुनिकीकरण की शुरूआत से ही इंसानों ने प्रकृति के उपर बहुत जुर्म ढाए हैं.....और धीरे धीरे करके आज जब हालात बेकाबू हो चुके हैं तो फिर उसे बचाने के लिए दुनियाभर के पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन सम्मेंलनों की रस्म अदायगी करके अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं...अगर इस संकट पर नजर डालें तो...धरती से खत्म हो रही प्रजातियों में 41 फीसदी उभयचर, 33 फीसदी प्रवाल, 25 फीसदी स्तनपायी, 13 फीसदी पक्षी और 23 फीसदी कोनफर वृक्ष हैं....बात अगर भारत के परिप्रेक्ष्य में करें तो, यहां की कुल आबादी लगभग एक अरब बीस करोड़ है, ...जो कि विश्व जनसंख्या का लगभग 18 फ़ीसदी है... इस देश में इंसान और वन्य-जन जीवन के लिए विश्व भूमि का 2.4 हिस्सा ही उपलब्ध है... इस स्थिति में दोनों के बीच संघर्ष होना लाजिमी ही है... और ज़ाहिर है कि इस लड़ाई में कहीं ना कहीं तात्कालिक जीत इंसानों को ही मिल रही है....हालांकि ये भी उतना ही सही है कि इसके बिना लंबे समय तक इंसानी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती...पिछले दशक में भारत ने कम से कम पांच दुर्लभ जानवर लुप्त होते देखे हैं... इनमें इंडियन चीता, छोटे क़द का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख़, जंगली उल्लू और हिमालयन बटेर शामिल है.. हालांकि देखा जाए तो भारत ने अपने जैव विविधता को बचाने के लिए कोशिश जरूर की है...सरकार ने देश का लगभग 5 फिसदी भौगोलिक हिस्से को सुरक्षित क्षेत्र में रखा है...बाघों की विलुप्ति होती संख्या पर तमाम समाजिक संगठन और पर्यावरणविद् जब सामने आए , तब सरकार ने कई योजनाओं के साथ लोगों में जागरुकता भी लाया...परिणामस्वरूप जहां 2006 में सिर्फ़ 1411 बांघ थे, वहीं 2011 में देश भर में 1706 वयस्क बाघ गिने गए थे।...पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार भारत इस समय जैव विविधता पर दो अरब डॉलर ख़र्च कर रहा है...परंतु ये तमाम योजनाएं बिना किसी दूरदर्शी नीति के खोखली साबित हो रही है... विश्व समुदाय की तमाम कोशिशों के बावजूद इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर ने चेताया है कि इस समय करीब 1 हजार दुर्लभ प्रजातियां ख़तरे में हैं... जबकि 2004 में यह संख्या केवल 650 थी...विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की शर्मनाक सूची में भारत चीन से ठीक बाद सातवें स्थान पर है...जानकारियों के मुताबिक, 5,490 स्तनधारी प्रजातियों में से हर पांचवीं प्रजाति लगभग विलुप्त होने के कगार पर हैं। जाहिर है, हमारी कोशिशों में चूक हो रही है। ...और अगर जल्द ही कड़े कदम नहीं उठाये गये तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

हिम्मत

पंकज की तबीयत रात से बहुत ख़राब है। देर रात काम करके आया था। सुबह सोकर जल्दी उठा। कुछ देर तक सोचता रहा की डॉक्टर के पास जाऊं या ड्यूटी पर जाऊं। काफी देर तक सोचने के बाद वो निर्णय लिया की डॉक्टर के पास जाऊंगा। पंकज अपने कमरे से निकला, गली की सीध वाले रास्ते के सामने ही मेन सड़क थी। रोड पारकर हल्की सी सांस लेते हुए वो बस स्टैंड पर बैठ गया। अस्पताल जा रहूं कहीं ज्यादा तबीयत न खराब हो जाए, बड़ी बीमारी निकल गई तो क्या करूंगा। घर में दो छोटे बच्चें है। बस स्टैंड पर बैठकर पंकज ये तमाम बाते अपने मन में सोचने लगा। तभी बस आई वो बैठ गया। अस्पताल पहुंचने के बाद उसने डॉक्टर से चेकअप करवाया। पंकज अभी फिलहाल ये दवाएं ले लो, तुम कल फिर आ जाना, डॉक्टर ने पंकज से कहा। अस्पताल से निकले के बाद दोपहर के दो बज गए थे। पंकज बिना कुछ खाएं पिए अपने फैक्ट्री लेदर की फैक्ट्री में वो काम करता था। दवाएं खाने के बाद उसकी तबीयत थोड़ी ठीक थी। उसने फिर रात के दो बजे तक काम किया और अपने कमरे पर आ गया। सुबह उसे जल्दी उठना था। और अस्पताल जाना था। लेकिन रिपोर्ट की चिंताओं ने रात भर उसके नींद में खलल डाला। सोचते-सोचते सुबह हो गया। पंकज फिर तैयार होकर अस्पताल चला गया। मरीजों की लाइन में उसका नंबर चौथा था। कुछ देर बाद डॉक्टर ने पंकज को बुलाया। अंदर से डरा सहमा पंकज डॉक्टर के केबिन में जाकर खड़ा था। अरे बैठ जाओ इतने डरे क्यों हो, डॉक्टर ने पंकज से कहा। पंकज बैठ गया। डॉक्टर ने पंकज से पूछा क्या काम करते हो, पंकज ने कहा ललल लेदर की फैक्ट्री में काम करता हूं। क्या बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है। अबकि बार पंकज डर गया। कुछ नहीं बोला। ....फिर डॉक्टर ने कहा पंकज तुम्हे ब्लड कैंसर हो गया है। थैलेसिमीयां। काटों तो खून नहीं ऐसी हालत हो गई पंकज की। उसे अपेन उपर विश्वास नहीं हुआ उसने फिर डॉक्टर से पूछा, सर मुझे क्या हो गया है। पंकज तुम्हे ब्लड कैंसर हो गया है, डॉक्टर ने पंकज कि ओर देखते हुए कहा। पंकज की ऑखों में आसू थे। उसने डॉक्टर कहा कि सर अब क्या कर सकता हूं। नाउम्मीद भरी सांत्वना देते हुए डॉक्टर ने पंकज से कहा चिंता मत करों इलाज होगा ठीक हो जाएगा। एक तरह से डॉक्टर की उस कुर्सी पर बैठे-बैठे पंकज बेहोश सा हो गया था। उसे सूझ नहीं रहा था कि वो करे तो क्या करे। दिवाल के सहारे एक अब एक नई जिंदगी जीने को सोचते हुए वो खड़ा हुआ। पंकज तुम चिंता करों कुछ पैसे लगेंगे भर्ती हो जाओं इलाज होगा ठीक हो जाओगे। डॉक्टर पंकज तो इस तरह से सांत्वना दे रहे थे, जैसे कोई मुरझाएं फूल को कह रहा हो कि तुम फिर जेठ की लिली की तरह खिल उठोगे। पंकज ठहरा एक मज़दूर आदमी उसको अभी महीने की तनख्वाह भी नहीं मिली थी। दूसरे वो दिल्ली के गोविंदपुरी में एक किराए की मकान में रहता था। बेचारे के पास अस्पताल में भर्ती होने के लिए पैसा नहीं था। वो अस्पताल से घर से चला आया। दूसरा कोई उपाय भी नहीं था उसके पास, हमारे देश में जो पहले पैसा दो फिर इलाज लो का संद्धांत है। क्योंकि उसकी पर्ची पहले कटनी थी। फिर जाकर वो कही अस्पताल में भर्ती हो पाता। सूरज ढल रहा था, शाम के करीब साढे छह बज रहे थे। छत पर बैठे बैठे वो तमाम सारी बाते सोचने लगा। इलाज कहां से होगा इस बारे में नहीं , बल्कि इस बारे में कि उसे दो बच्चे है, पत्नि है, दोनों बच्चे अभी छोटे है, बड़ा वाला करीब आठ साल का है, और दूसरा करीब पांच साल का। उसका पूरा परिवार गावं में रहता है और दिल्ली शहर में अकेला। मै नहीं रहा तो मेरे भाई ज़मीन हड़प लेगे, बीवी बच्चे कहां रहेंगे। पंकज ये तमाम सारी बात सोचने लगा। रात अंधेरा हो चुका था, सर्दी का महिना था। ओस गिरना शुरू हो गया था। अब वो छत से नीचे चला आया। काफी देर तक सोचना लगा क्या बना कर खाऊं, सुबह से पंकज कुछ खाया नहीं था, उसके कमरे में आटा और चावल तो था। लेकिन सब्जी नहीं थी, सब्जी के लिए बाजार जाना पड़ता। एक तो पहले से ही उसकी तबियत खराब, मन मारकर पंकज बाजार नहीं गया। स्टोव जलाया और तीन रोटी बनाई, थोड़ी देर बाद प्याज और नमक के साथ रोटी खा लिया। नींद तो आ नहीं रही थी। कैसे-कैसे बेचारा फर्श पर चद्दर बिछाकर लेट गया। रात भर सो नहीं पाया। कभी उठकर बैठ जाता, तो कभी फिर सो जाता था। रात भर यही करते करते सुबह हो गई। सुबह के नौ बज चुक है, उसे काम पर जाना है। लेकिन पंकज जब ये सुना है कि उसे कैंसर है, उसकी तबियत मानसिक रूप से पहले ज्यादा ख़राब हो गई है। अब वो हर वक्त काम करते हुए कराहता रहता है। घर में उसकी कोई बड़ी आमदनी नहीं है जिससे वो घर से पैसे मंगाकर अपना इलाज करवा सके। पंकज के तीन भाई है तीनों उसकी शादी के बाद से ही अलग रहते है । मतलब अब उसे अपने दोनों बच्चों और बीवी के साथ उसे अपने इलाज का भी खर्च उठाना है। कहानी जारी है...

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

वो छत पर आई...और हम पास हो गए...


सुबह सो कर उठते ही इस बात का इंतजार रहता था कि कब तीन बजे। पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी जो करनी थी। एक ही खटिया थी। तीन बजे के बाद सूरज थोड़ा पश्चिम हो जाता था।  दीवार के किनारे छांव हो जाती थी। कौन खटिया के पश्चिम में बैठेगा और कौन पूरब इस बात की लड़ाई उजाले से सूरज के ढलने तक होती थी। थोड़े से छांव में रखे खटिया पर अक्सर ब्लू क लर का चादर बिछा देते थे। दोनों दिशाओं में बैठने की हड़बोड़ में बिछे चादर का पता भी नहीं चलता था। पूरब की ओर मुंह करके बैठना फायदेमंद था। इसीलिए हर वक्त इसी की लड़ाई होती थी। एक बैट बॉल भी थी। उसमें भी झंझट ही था। अधिकतर हम आपस में क्रिकेट खेलते वक्त सोचते है कि सबसे ज्यादा बैंटिग मिले। लेकिन उस  समय हम दोनों को बॉलिग करना ज्यादा फायदेमंद था। क्योंकि देखना  पूरब ही था। हां बैट बड़ा अजीब था,  छत पर एक लकड़ी का पटरा था, उसे बैट बना लिया था। उसे छिपाना भी था तो दीवारों के किनारों ही खेलते थे कि दूसरे को  दिख न पाए कि हम पटरी से खेल रहे है।  मै या अभिमन्यु में इस बात की होड़ लगी रहती थी बॉल हम फेकेंगे हम फेकेंगे। इसीलिए पूरब की ओर मूह करके बॉ फेकना होता था, जहां वो डेली  पूरब में उस छत पर तीन बजे के बाद आ जाती थी,  बॉल फेंकते फेंकते दीवार के उस पार भी चली जाती थी, पर अफसोस नहीं रहता क्योंकि दो रूपए वाली बाल रहती थी। न ज्यादा उड़ती थी न ज्यादा कूदती थी। दो छतों को पार कर तीसरे छत पर वो पिछले एक महीने से डेली आ जाती थी। पता नहीं कैसा एक अनजाना सा मूक लगाव हो गया था उससे। कभी कभी आवाज भी केवल उसी छत से आ जाती थी। पर हमारे छत से 'बर्फी' जैसी प्रतिक्रिया ही होती थी। क्योंकि हम दोनों ठहरे फट्टू आदमी। दुनिया भर की समाचार पत्रों की कतरन काटकर इक्कठा कर लिए थे। पढ़ते एक नहीं अगर पढ़ने बैठ गए तो  उन कतरनों की लाइनों से इतना मतभेद की बहस में घंटा बीत जाता था।  पिछले करीब पंद्रह दिन से यही सिलसिला जारी था। दिन से सूरज के लालिमा तक पढ़ाई करके थक जाते थे। तो फिर एक दो किलोमीटर की सैर करके आ जाते थे। उसके बाद खाना बनाते और खाकर सो जाते । सोने के बाद भी अगले सूर्योदय के तीन बजे का  इंतजार रहता था।जामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई करनी थी। शौक मित्र महोदय अभिमन्यु साहब ने लाई थी। हुजूर का फरमान था की करेंगे तो जर्नलिज्म ही करेंगे।  अब जामिया से पढ़ने के लिए एंट्रेंस एग्जाम पास करना तो जरूरी था न , तो महीने भर से पढ़ाई शुरू कर दी थी, उस समय बदरपुर में मै जिस मकान में रहता था उस घर में कोई था नहीं । मकान मालिक ठहरा अपना दोस्त। परवाह किसी बात की थी नहीं सिवाय बेइज्जती के । क्योंकी अगल बगल  सब जानने वाले थे। सब अपनी तो ठाठ थी। पूरब की ओर देखते देखते कब परीक्षा का डेट आ गया पता ही नही चला। कल परीक्षा थी आज हम फिर सुबह से तीन बजे का इंतजार कर रहे थे। तीन बजा फिर छत पर पढ़ने के लिए चले गए। कुछ देर तक पढ़े। संसद में महिला आरक्षण और मीडिया में जनगणना में जाति का नाम शामिल करने पर पर बड़ी गहमा गहमी थी।  पढ़ाई शुरू करते ही हमने इन मुद्दों पर बहस शुरू कर दी थी। अब जब बहस शुरू हो गया तो पढ़ाई कहां होनी थी। थोड़ी देर बहस में गहमा थी, फिर आ गए अपनी लाइन पर, जो वो...छत पर आ गई थी। बैट बॉल शुरू हो गई, खेलते खेलते सूरज ढल गया...और दूसरे दिन एग्जाम था। तीस जुलाई को रिज्लट आया और हम पास हो गए



 

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

इंतजाम हो गया है...

सर नीचे लटकाए , कभी इधर उधर देखते आगे चले जा रहे है। मेन गेट से एंट्री करने के बाद थोड़ा दाएं मुड़े, फिर सीधे उस कमरे में चले गए। मैंन दूसरी बार और महेश पहली बार जामिया में परीक्षा देने गए थे। करीब दो घंटे का पेपर था। ज्योग्राफी का एमए का पेपर था। दिल्ली विश्वविद्यालय से भी ज्योग्राफी में ही बीए ऑनर्स किया था। वैसे परीक्षा तो दे दिए, पर दिल से कहे तो पढ़ने का मन था नहीं। इसलिए भी नहीं की प्रतिदिन अगले दिन के बारे में सोचना पड़ता था। अब ज्यादा पीछे की बात करना नहीं चाहता। परीक्षा खत्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त महेश, ऊर्दू विभाग के पीछे बने एक चबूतरे पर बैठ गए। महेश कहता है, यार तेरा जर्नलिज्म में हो गया तो तू एडमिशन ले लेना। मैंने कहा कि यार देखते है । फिर कहता है कि कोई दिक्कत है तो बता। मैंने कहा ननन नहीं, कोई दिक्कत नहीं है। फिर महेश कहता है देख एक साल का कोर्स है कि एमए से तो बढ़िया है। कम से कम जर्नलिज्म करने के बाद तूझे जॉब तो मिल जाएगी। तेरा खर्चा तो निकल जाएगा। मै सब बड़े ध्यान से सुन रहा था। पर कुछ बोल नहीं रहा था। फिर मेरी तरफ देखते हुए कहता है बता कोई दिक्कत है तो। फिर मैंने कहा नननन नहीं है। थोड़ी देर बाद मैंने कहा  यार देख, तीस हजार के करीब फीस है, इतनी व्यवस्था हो नहीं पाएगी, और रही बात इतने पैसों की,,, तो मेरे घर में इतना पैसा एक बार में 1997 के बाद से आया ही नहीं। सोचता हूं इस साल कॉल सेंटर में नौकरी कर लूं, कुछ पैसे इक्कठे करके अगले साल आईआईएमसी में एडमिशन ले लूंगा। मैने कहा। महेश ने सर पर एक थप्पड़ मारते हुए कहा कितने पैसे कमा लेगा तूं कॉल सेंटर से। एक साल नौकरी करेगा तो कितने पैसे मिलेंगे तूझे, करीब वहीं पचास - पचपन हजार। फिर रूम का खर्चा है अपना खर्चा, दस हजार भी नहीं बचेंगे। और आईआईएमसी में एडमिशन के लिए साठ सत्तर हजार रूपए चाहिए। देख तू ऐ सब फालतू के कामों में मत पड़। कुछ व्यवस्था करते है तो तू जामिया में एडमिशन ले लेना। दरअसल मैंने अपने दोस्त अभिमन्यु के साथ जामिया में जर्नलिज्म का प्रवेश परीक्षा दिया था। और एडमिशन लेने का ख्वाब अभी परीक्षा परिणाम आने से पहले ही हम दोनों देख रहे थे। एडमिशन को लेकर दुनिया भर का रणनीति बना रहे थे। कि ऐसे पैसे का इंतजाम करेंगे वैसे करेंगे।
तीस जून को रिजल्ट भी आ गया। मै तो पास हो गया। मेरा दोस्त अभिमन्यू को वेटिंग लिस्ट में नाम आ गया। बड़ी दुविधा में फंस गए हम। मेरा तो वैसे ही जनर्लिज्म करने का मन नही  था। मैने अभिमन्यू को कहा यार ऐसा कर मै अपना एडमिशन केंसल करा लूंगा और तू एडमिशन ले ले। उसका वेटिंग लिस्ट में पहला नाम था। फिर वो कहने लगा नहीं तू पढ़ेगा तभी मै पढूंगा।फिर महेश का फोन आया। क्या रहा रिजल्ट का , महेश मुझसे पूछा। मैने कहा पास तो गया पर या पढ़ना नहीं है मुझे। अबे साले बेवकूफ है क्या। महेश ने मुझे कहा। यार नहीं पर पैसे का इंतजाम नहीं हो सकता। कितनी फीस है, महेश ने मुझसे पूछा। मैने कहा यार करीब अठ्ठाइस हजार तो लग ही जाएंगें। ऐसा कर कुछ तू व्यवस्था कर और करीब बीस हजार की व्यवस्था करने की कोशिश मै करता हूं। महेश ने मुझसे कहा। फिर मैंने एक दिन बाद घर फोन किया। सीधे तो पापा से  नहीं कह सकता कि एडमिशन के लिए दस-बारह हजार रुपयों की जरूरत है। क्योंकि घर की परिस्थिति समझता हूं। तोड़ा इधर उधर की बात की , फिर कहा कि पापा वो जो जामिया का एक एग्जाम दिया था न वो ...मैंने पास कर लिया है। पापा ने कहा बहुत अच्छा । किस चीज का एग्जाम था, पापा ने मुझसे पूछा। मैंने कहा पापा वो पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए परीक्षा दिया था। क्या होगा इससे, पापा ने मुझसे पूछा। पापा इसे पढ़कर किसी टीवी चैनल या समाचार पत्र में नौकरी कर सकते है। मैंने पापा से कहा। तो बताओं पैसा वैइसा भी लगेगा का , पापा ने मुझसे पूछा। मैंने कहा पापा वो ...क्या है कि फीस तो ज्यादा है पर वो जेएनयू वाला मेरा दोस्त है न महेश ...वो... बीस हजार रूपए देने को कह रहा है। कह रहा  है कि और कि कुछ तू इक्कठा कर ले। पापा ने फिर पूछा कितने रूपयों की जरुरत होगी , मैंने कहा पापा कम से कम दस हजार तो चाहिए ही। यार अभी है तो नहीं पर देखता हूं, पापा ने कहा। तीन दिन बाद पापा का फोन आया, बारह हजार का इंतजाम हो गया है भेज दूं या और चाहिए,  पापा ने मुझसे पूछा । मैने कहा नहीं बस हो जाएगा। दो दिन बाद उन्होंने पंद्रह हजार रूपए मेरे एकाउंट में डाल दिए।  सात जुलाई को जामिया में एडमिशन होना था। पांच को महेश का फोन आया यार पंद्रह हजार का इंतजाम हो पाया है । काम चल जाएगा। मैने कहा चल जाएगा। देखता हूं कल और इंतजाम कर देता हूं कम से कम अठ्ठारह तो कर ही देता हूं। महेश ने कहा।  6 तारीख को शाम को महेश का फोन आया , कहां है  महेश ने मुझसे पूछा , घर पर ही हूं मैंने कहा। ऐसा कर मेरे घर पर आ जा कल एडमिशन के लिए यहीं से जामिया चला जाइओं। मैने अठ्ठारह हजार का इंतजाम कर दिया है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

समुदाय की अनदेखी, विनाश का विकास





दार्शनिकों, और विषय के विशेषज्ञों की नज़र में हर एक च़ीज की परिभाषाएं अलग अलग होती है ...आम तौर पर सबसे ज्यादा प्रभावशाली परिभाषाएं दाशर्निकों की मानी जाती है ..लेकन एक ऐसे समाज में जहां समाज पर सरकार नामक संस्था का शासन होता है .. वहां पर अधिकतर विशेषज्ञों की ही परिभाषाओं पर अमल किया जाता है...क्योंकि सरकार नामक संस्था विशेषज्ञों पर ही टिकी होती ही ..और ये विशेषज्ञ हमेशा ऐसी रणनीति बनाते है...जिससे फायदा इनके ही पक्ष में होता है...आलेख का शीर्षक समुदाय की अनदेखी और विनाश का विकास है...समुदाय एक ऐसी संज्ञा जो कभी सरकार नाम की संस्था द्वारा प्रयोग नही किया जाता...कहने के सरकार ने तमाम सारी योजनाएं सविंधान संशोधन कर पंचायती राज व्यवस्था को जन्म दिया है ..लेकिन भ्रटाचार के आकंठ में डूबी में इन संस्थाओं के लिए समुदाय की कोई महत्ता नहीं है...विकास, वर्तमान समाज की एक जरूरत कि वो इसके लिए अपना सब कुछ दाव पर लगाने के तैयार है...समाज, परिवार, विद्यालय नाम की संस्थाएं अब अपने वजूद से भटक चुकी है...तो क्यों न समुदाय का अस्तित्व ख़त्म हो..भारतीय परिवेश में परंपरा रही है कि समुदाय हर एक कामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है ..लेकिऩ वर्तमान विकास की नींव एक सामाजिक समुदाय पर नही बल्कि निजी समुदाय पर अधारित है ...जिसका उद्देश्य हर वक्त शुद्ध लाभ लाभ और या यूं कहें मुनाफ़ा कमाना है ...दरअसल समुदाय का प्रकृति और अपने संस्कृति से रिश्ता भावनात्मक होता है लेकिन कॉर्पोरेट का प्रकृति या मानव समाज से रिश्ता मुनाफ़ा का होता है...यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने एक बार उतराखंड में अपने दौरे के दौरान कहा था..कि सरका के अधीन आने वाले वनों से ज्यादा बेहतर स्थिति पंचायत के अन्दर आने वाली वनों की है...इस बाक में कोई अतिश्योक्ति नहीं है....क्यों एक सामाजिक मनुष्य ये बार बार कहता रहता है कि आदिवासियों का जंगल सें जन्म का भावनात्मक रिश्ता है...सबसे बड़ी बात की क्यों आज जो भी वन क्षेत्र बचा है वो केवल आदिवासी बहुल इलाके में ही है..क्योंकि समुदाय विशेष का अपने प्रकृति से लगाव अपने पुत्र के समान होता है ...लेकिन वर्तमान में विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हुए हमने समुदाय नाम की जो संस्था थी उसे लात मार दिया...नतीजन विकास व्यवहारिक नहीं बल्कि संस्थागत हो गया...जिसका अंतिम लक्ष्य किसी भी तरह मनुष्य का कल्याण नहीं बल्कि शोषण है...भारत में आज तक समाज के विकास के लिए ऐसी कोई योजना नहीं जिसका आधार सामुदायिक रहा हो...योजनाएं के नाम जरूर सामुदायिक क्योंकि इस सरकार और नौकरशाही को इस संस्था की उपहास जो उड़ाना था.....स्वंतत्र भारत में के इतिहास में विकास के लिए बनीं परियोजनाओं में दामोदर नदी घाटी परियोजना ज्यादा तो नही पर करीब 30 प्रतिशत समुदाय अधारित परियोजना जरूर थी...लेकिन इस परियोजना में भी स्थानीय लोगों को कम बाहरी लोगों को ज्यादा फायदा हुआ...विकास में स्थानीय लोगों की अनदेखी कही से भी समाज , सरकार या नीति नियंताओं के लिए फायदेमंद नही रही...अपने देश में ही कुछ उदाहरण ऐसे है..जो इस बात को साबित करते है कि विकास में स्थानीय समाज की भागीदारी से सतत विकास संभव है...राजस्थान के विश्नोई समुदाय का उदारहण दिया जा सकता है ...इन्होने अपने पारंपरिक करीकों से न केवल अपने क्षेत्र के पेड़ों की रक्षा की बल्कि पारस्थितिकी तंत्र में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई...भारत के जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने समुदाय अधारित योजनाए बनाकर ही ..क्षेत्र की तमाम नदियों को जीवित किया..और गिरते भूमिगत जल स्तर को उंचा उठाया...ऐसे ही राजस्थान की तमाम क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल कर जल संरक्षण किया जाता है ...इन लोगों को कोई सरकार कोई संस्था ये कहने नही आती की आप जल संरक्षण किजीए...वहीं सरकार के तमाम प्रयास के बावजूद लोग शहरी क्षेत्रों में जल सरंक्षम में महत्व नहीं देते...सरकार कितने ही प्रयास कर ले लेकिन लोग न जल का सदुपयोग करते है..न वर्षा जल का संरक्षण....क्योंकि पहले तो सरकार ने सभी उपलब्ध जल स्रोतों का दुरूपयोग किया..उसके बाद जनता के उपर जल संरक्षण के काम को थोप दिया....ऐसे में जनता सरकार की बेगारी नही करना चाहती....
अब बात आदिवासी क्षेत्रों के विकास की करते है...स्वतंत्र भारत में यदि कोई सबसे सरकार से सबसे ज्यदा शोषित हुआ है तो वो है देश का आदिवासी समाज...कहने को देश में लोकतांत्रिक सरकार है...भारत का संविधान का सबको समान अधिकार देता है ...लेकिन क्या इस देश में समानता लागू हो पाई कत्तई नहीं...आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास के नाम जितना विनाश हुआ शायद कही नही हुआ शायद ये देश का दुर्भाग्य है कि जिन क्षेत्रों में आदिवासी रहते है उन्ही क्षेत्रों में देश के महत्वपूर्ण संसाधन पाए जाते है ...और इन समुदायों की अनदेखी कर जो विकास किए गए है वो किसी विनाश से कम नहीं हैं....आदिवासी बहुल इलाकों में खनिजों के दोहन के लिए लाखों परिवारों को उजाड़ दिया गया...छत्तीसगढ़, ओडिशा. झारखंड बंगाल में हज़ारों आदिवासी गांवों को निजी कंपनियो के दबाव में उज़ाड़ दिया गया...उजाड़ने के पीछे तर्क दिया गया कि खनिज संसाधनो के दोहन से देश और समाज का विकास होगा...लेकिन क्या इन क्षेत्रों के आदिवासियों का विकास हुआ...नहीं हुआ बल्कि इन्हे इनके ही प्राकृतिक इलाकों से खदेड़ दिया गया...इन लोगों के न पुर्नवास की व्यवस्था की गई...और न ही इनकों रोजगार मिला...ज्यादा कुछ नहीं इस बात को सोचिए कि क्या इनके घरों को उजाड़ने से पहले इनसे पूछा तक गया...क्या इनके इलाकों में उद्योग कौन सा, कैसे, किस प्रकार लगाया जाए कभी इन लोगों से विचार विमर्श किया गया...आप इन लाइनों पर सवाल खड़े कर सकते..कि किसी भी उद्योग को लगाने के लिए सरकार जनता से क्यों पूछे..पर सोचिए आलीशन कोठियों में बैठकर योजनाए बनाने वाली नौकरशाही अगर जनता से प्रत्यक्ष रूप से राय मिशविरा कर योजनाओं को धरातल पर लागू करती है जिसमें स्थानीय जनता की भी सहमती हो तो जनता सरकार के उस काम को अपना समझ कर स्वीकार करेगी...आखिर क्यों आज आदिवासी लोग अपने ही सरकार के खिलाफ हथियार उठाए हुए है ...क्यों लोग सरकार के उस विकास की अवधरणा से सहमत नही है ...जिसका विकास सरकार कर रही है...इसलिए की सरकार के विकास में उस जनता की भागीदारी नगण्य है...